Zamane bhar ki yad mai mujhe na bhula dena, jab kabhi yaad aaye to zara muskura lena, Zinda rahe to fir milnge, Varna Diwali mai ek diya mere naam ka bhi jala lena….
पर्दे पर विज्ञापन का चलने के लिये खबरों का पकना जरूरी है। ढंग से पके सनसनी अपना रसोईया रखना जरूरी है। -- अपने पर लगा इल्जाम बचने के लिये रोना भी अच्छा बहाना है। एक ही बार तो आंसुओं में नहाना है। ---- प्यास अगर पानी की होती नल से बुझा लेते। दर्द बेवफाई का है कैसे इश्क की दवा सुझा देते। -- फरिश्तों को पहचाने दिलाने के लिये शैतान पाले जाते हैं। इसलिये अपराधों पर पर्दे डाले जाते हैं। - सपने नहीं बेच पाये लोगों को गरीब बताने लगे। काठ की हांड जब दोबारा नहीं चढ़ी खराब नसीब बताने लगे। - दिल अगले पल क्या सोचेगा हमें पता नहीं है। वफा हो जाये तो ठीक बेवफाई की खता नहीं है। --- भूख से ज्यादा थोपा गया मौन सताता है। भीड़ की चिल्लपों में भी वही याद आता है। - पर्दे पर सौंदर्यबोध की अनुभूति ज्यादा बढ़ी है। मुश्किल यह कि जमीन पर सुंदरता बिना मेकअप के खड़ी है। - वह भूत ही होंगे जो ज़माने को लूट जाते हैं। सभी इंसान निर्दोष है इसलिये छूट जाते हैं। --- देह से दूर हैं तो क्या दिल के...
मधुरता से मिठास मिलना भी जरूरी है, रस भरी छाप में स्वादा भी जरूरी है। ‘दीपकबापू’ शब्दालंकार से सजाते रोज नये नारे, अर्थ से जिनकी बहुत दूरी है।। ---- सब अपने दर्द पर भीड़ में रोते हैं, फैला रहे कू्रड़ा बाहर घर ही अपना धोते हैं। ‘दीपकबापू’ आमंत्रण भेजते रोगों को, किताबों में लिखी दवायें बेबसी में ढोते हैं।। --- प्रचार के दलाल गरीब नाम से पले, नारियों की बेबसी से महंगे विज्ञापन चले। ‘दीपकबापू’ थाली में खाकर ढेर छेद करें, अयोग्यता छिपाते बनते सबसे भले।। --- अपनी पुरानी सोच पर सब अड़े हैं, पुराने बुतों की यादें ल्रेकर खड़े हैं। ‘दीपकबापू’ अंग्रेजी पढ़े नये गंवार, पुरानी सभ्यता की नयी जंग लड़े हैं।। --- लोहे पर रंग चढ़ना ही विकास नाम, मनुष्य का अब भाव से नहीं रहा काम। ‘दीपकबापू’ शेर छवि पर चाल भेड़ जैसी, मकान खाली पड़े सड़क पर है जाम।। ---
लोभ लालच के मन में बोते बीज, देह बना रहे राजरोग की मरीज। कहें दीपकबापू सोच बना ली राख, तब चिंता निवारण पर मत खीज। -------- सोना चमके पर अनाज नहीं है। सुर लगे बेसुर क्योंकि साज नहीं है। कहें दीपकबापू महल तो रौशन राजा भी दिखे पर राज नहीं है। --- खबर से पहले घटना तय होती, विज्ञापन से बहस में लय होती। कहें दीपकबापू फिक्स हर खेल जज़्बात से सजी हर शय होती। ------ पत्थरों के टूटने पर क्यों रोते हो, दृष्टिदोष मन में क्यो बोते हो। कहें दीपकबापू नश्वर संसार में विध्वंस पर आपा क्यों खोते हो।। ---- बेरहमों ने बहुत कमा लिया, बंदरों के हाथ उस्तरा थमा दिया। कहें दीपकबापू मत बन हमदर्द दर्द ने अपना बाजार ज़मा लिया। --- तन मन की हवस एक समान, लालच के जाल में फंसा हर इंसान। कहें दीपकबापू धर्म कर्म से जो रहित, सौदागर देते सस्ते ग्राहक का मान। --- एक दूसरे में लोग ढूंढते कमी। आपस में नही किसी की जमी। कहें दीपकबापू दर्द बंटता है तभी जब कहीं शादी हो या गमी। ----
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